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यह सत्य  मार्ग है 


सत्य क्या है ? असत्य क्या है ? सत्य वह है जिसमें कभी कोई परिवर्तन न हो जैसा पहले था वैसा अब भी है और आगे भी वैसा हे रहेगा | असत्य वह है जो बनता बिगड़ता है | संत महात्माओं ने जगत नाशवान कहा है, मनुष्य का शरीर नाशवान है, शरीर के सम्बन्धी भी नाशवान है, सम्बंधित पदार्थ new year 214-smallभी नाशवान हैं | जो कुछ हम इन आखों से देखतें हैं, कानों से सुनतें हैं और इन्द्रियों के द्वारा जो कुछ भी हम अनुभव करतें हैं, मन की पहुँच जहाँ तक है वह सब मिथ्या है अर्थात नाशवान है |

गो गोचर जहं लगि मन जाई |
सो सब माया जनेउ भाई ||

केवल राम नाम सत्य है, बाकी सब मिथ्या है | राम नाम सत्य है ऐसा कहा गया है इसमें गूढ़ रहस्य है नाम दो प्रकार का होता है |
१. वर्णात्मक नाम
२. ध्वन्यात्मक नाम
वर्णात्मक नाम वह है जो वाणी द्वारा बोला जा सके और लिखने पढने में आये,

” लिखन और पढ़न में आया, उसे वर्णात्मक गाया “

वर्णात्मक नाम जैसे – राम, कृष्ण, अल्ला, खुदा, गोद, गोविन्द, गोपाल आदि | अब यह सोचना चाहिए की जब कोई भाषा नहीं थी, कोई वर्णमाला नहीं थी, कागज, स्याही नहीं थी, कोई मनुष्य नहीं था, चौरासी लाख योनियाँ नहीं थी, कोई देवी-देवता नहीं थे, ब्रहमा, विष्णु, महेश नहीं थे, कोई अवतार नहीं था, कोई पैगम्बर नहीं थे, कोई तीर्थकर नहीं थे, स्वर्ग, नर्क, पाताल नहीं था, तीन लोक चौदह भुवन नहीं थे | तीन लोक और चौदह भुवन की रचना का मसाला पांच तत्त्व व तीन गुण हैं यह भी नहीं था, तीन गुण जहाँ से प्रगट हुए वह भी नहीं था पूरी त्रिलोकी शून्य थी यह शून्य देश था इस शून्य से परे महासुन्न और भंवर गुफा भी नहीं थे कोई रचना नहीं थी रचना की आदि कैसे हुई ? तब परमात्मा का क्या स्वरुप था ? रचना की उत्पत्ति कैसे हुई ? यह सब हाल घट के अन्दर देखने और समझने के लिए सत्य मार्ग की आवशयकता है, अभी तक वर्णात्मक नाम के बारे में जो थोड़ा बताया गया है इससे परे ध्वन्यात्मक नाम है | जो परम प्रकाश रूप है यह वाणी द्वारा नहीं बोला जा सकता, और न लिखने पढ़ने में आ सकता है |
यह नाम मनुष्य शरीर के घट के अन्दर है | संत महात्माओं ने इसी परम प्रकाश रूप ध्वन्यात्मक नाम की महिमा गाई है लोगों ने इसे वर्णात्मक तक ही सीमित रखा |

राम नाम चिंतामनि सुन्दर |
बसई गरुड़ जाके उर अंतर ||
परम प्रकास रूप दिन राती |
नहि कछु चहिअ दिआ घृत बाती ||

दूसरा प्रमाण देखिये –

श्री गुरु पद नख मनि गन जोती |
सुमिरत दिव्य दुष्टि हियँ होती ||
दलन मोह तम सो प्रकासू |
बड़े भाग उर आवहि जासू ||
उधरहिं बिमल बिलोचन हीयके |
मिटहिं दोष दुःख भाव रजनी के ||
सूझहिं राम चरित मनि मानिक |
गुप्त प्रगट जहं जो जेहि खानिक ||

पहले गुरु चरण घट में प्रगट हों उनके नखों के प्रकाश से दिव्य दुष्टि प्राप्त होगी जिससे राम नाम रुपी हीरा घट के अन्दर दिखाई देगा, जो परम प्रकाश रूप है | नाम की महिमा तीनों लोकों में कोई नहीं जानता, केवल संत नाम की महिमा जानते हैं |

” तीन लोक में व्यापक काल ,
चौथे में रहे नाम दयाल “

तीनों लोकों में काल और माया व्याप्त है, यह रचना मिलौनी की है, चौथे लोक अर्थात दयाल देश में जिसे निर्मल चैतन्य देश या अमर देश भी कहतें हैं इसकी रचना विशुद्ध चेतन है, यहाँ नाम आदि भण्डार है | नाम नाम सब कहत हैं, नाम न पाया कोई

नाम न पाया कोई, नाम की गति है न्यारी
वही सकस को मिले, जिन्होंने आशा मारी
हौं को करे खमोस, होश न तन को राखै
गगन गुफा के बीच, पियाला नाम को चाखै

 संत सनेही नाम है, नाम सनेही संत
नाम सनेही संत, नाम को वही मिलावैं
वे हैं वाकिफकार, मिलन की रह बतावें
जप ताप सयम, तीरथ बरत, करे बहुतेरा कोई
बिना वशीला संत, नाम से भेंट न होई
कोटिन करै उपाय, भटक सगरों जग आवै
संत दुआरे जाय, नाम को घर तब पावै

यह नाम जो परम प्रकाश रूप और ध्वन्यात्मक है | पूरे गुरु अर्थात संत सतगुरु से ही मिल सकता है अन्य किसी भी उपाय से नहीं इसी नाम मार्ग का उपदेश कबीर साहब, संत रविदास, गुरुनानक देव जी, पलटू साहब, दादू दयाल साहब, तुलसी साहब, स्वामी जी महाराज आगरा वाले, मियां शम्स तपरेज, मौलानारूम, ख्वाजा साहब, संत मूसा फरीद साहब आदि संतों ने किया | यह नाम परम प्रकाश रूप और ध्वन्यात्मक है यह नाम विदेह है, भाषा रहित है, मन इन्द्रियों से परे है | हर मनुष्य शरीर के अन्दर इसके मिलने का सत्य मार्ग है | यह नाम किसी भी टेक से प्राप्त नहीं हो सकता | सच्चे खोजी को सतगुरु पूरे अर्थात मुरशिद कामिल से प्राप्त होगा पिछले संतों ने भी कहा है की टेक छोड़ कर सतगुरु वक़्त खोजो | स्वामी जी महाराज आगरावालों ने कहा –

” पिछलों को जो धारें टेका, जिनको कभी आँख नहीं देखा ”
पोथिन में सुनी उनकी महिमा, टेक बाँध मन सबका भरमा ||

पिछले संतों को जिनको अपनी आँखों से नहीं देखा और पोथियों में उनकी महिमा का वर्णन करके भक्ति करने लगे और उनके टेकी हो गए | टेक बाँध कर सबका मन भरमा गया काल औ माया ने पिछली टेक में भरमा दिया | आगे कहा

क्या दादू क्या नानक पंथी | क्या कबीर क्या पलटू संती ||
सब मिल करते पिछली टेका | वक़्त गुरु का खोज न नेका ||

काल और माया ने पिछली टेक में भरमा दिया | वक़्त गुरु की खोज नहीं की वक़्त गुरु जब तब नहीं मिलेंगे | अनुरागी जीव का भी काम नहीं पूरा होगा|

वक़्त गुरु जब लगि नहि मिलई |
अनुरागी का काज न सरई ||

अब सोचना चाहिये कि स्वामी जी महाराज आगरा वालों की आज्ञा का पालन जो करना चाहतें हैं उनको सतगुरु वक़्त की खोज करनी चाहिये | यही पिछले सभी संतों का आदेश है | पूरे गुरु अर्थात संत सतगुरु से उपदेश लेकर सुरति शब्द मार्ग पर चलना ही राधास्वामी मत है | यही कबीर पंथ है सभी संतों का मार्ग सुरति शब्द मार्ग अर्थात नाम मार्ग है | यह नाम विदेह है भाषा रहित है मन इन्द्रियों से परे है इसे सार नाम या सार शब्द भी कहतें हैं कुल रचना की उत्पत्ति इसी से हुई है | मिलौनी की रचना जड़ और चेतन तथा निर्मल चैतन्य रचना सब नाम से ही हुई है |

” शब्द ने रची त्रिलोकी सारी, शब्द से माया फैली भारी “

यह नाम सगुण और निर्गुण दोनों से बड़ा है गोस्वामी जी ने कहा है |

अगुन सगुन दुई ब्रह्म सरूपा |
अकथ अगाध अनादि अनूपा ||
मोरे मत बड़ नाम दुहू तें |
किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ||
कहौं कहां लगि नाम बड़ाई |
राम न सकहिं नाम गुन गाई ||

ब्रह्म राम ते नाम बड़, बर दायक बर दानि |
निरगुन ते एहि भांति बड़. नाम प्रभाऊ अपार |
कहूं नामु बड़ राम ते, निज बिचार अनुसार ||

नाम रूप गति अकथ कहानी |
समुझत सुखद न परति बखानी ||

यह नाम ध्वन्यात्मक है और रूप उसका परम प्रकाश रूप है यह चेतन का आदि भण्डार है | कुल रचना की उत्पत्ति इसी से हुई | संतों ने इसी नाम की महिमा गाई है | जिनको घट का भेद नहीं मिला, क्योंकि उनको पूरे गुरु नहीं मिले इसी लिए वर्णात्मक तक ही सीमित रह गये और नाम का परिचय नहि मिला | आप लोग यदि सत्य मार्ग के बारे में जानना चाहतें हैं | सच्चे परमार्थी जीव हैं तो सभी प्रकार की टेक छोड़कर संत सतगुरु वक़्त की शरण लें | सभी मनुष्यों के अन्तर का सत्य मार्ग एक हे है इसीलिए सभी से आपस में प्रेम व सदभाव रखना चाहिये |

” जांति पातिं पूछे नहि कोई,
हरी का भजै सो हरि का होई “

हमारे गुरूजी की शरण में सभी पंथ, मजहब व सभी जातियों के लोग आ रहे हैं | आप लोग इस सत्संग में आकर वास्तविकता को समझें और जब पूरी तरह से सत्संग द्वारा संतुष्ट हो जायें तब मार्ग ग्रहण करें | कोई प्रतिबन्ध नहीं है की आप इनके शिष्य बनें या न बनें | आपको वास्तविकता जानने के लिए सत्संग में आना आवश्यक है | परमपुरुष पूरण धनि स्वामी संतदास जी महाराज मेरे गुरूजी हैं जो की पूरे गुरु अर्थात संत सतगुरु वक़्त हैं |

सब जीवों आओ जल्दी अब प्यारे सतगुरु के चरणों में |
यह सत्यमार्ग है संतों का मुक्ति सतगुरु के चरणों में ||
सेवक यह चरणदास तेरा गुरु चरण शीश पर रखता है |
मांगता भीख गुरु भक्ति भक्ति की गुरु मूरति हिय में रखता है ||
यह देश पराया है भाई मत समझो तुम इसको अपना |
सूत, दारा, बन्धु, सभी परिजन असबाब जगत का है सपना ||
सब जाल बिछाया काल बलि माया सबको खा जाती है |
ऋषि मुनि अवतार ज्ञानीयों को पल भर में मार गिरती है ||
आकर सतगुरु के चरणों में यह सुरति शब्द मारग धारो |
कर नाम कमी निष् दिन तुम माया और काल जाल जारो ||
जब मेरह करे सतगुरु पूरे, बन जाये सब कारज तेरा |
सब आवागमन मिटे भारी हो जाये बेड़ा पार तेरा ||
पकड़े तब सुरति शब्द घट में चढ़ जाये सतगुरु बल पाकर |
पहुँच निज घर में सुरति तभी मिल जाये जब सतगुरु आकर ||
चरणदास पुकार पुकार कहे जल्दी आओ मेरे प्यारे |
सत्तनाम जहाज में बैठो अब हो जाओ तुम जग से न्यारे ||

—– चरणदास